Tuesday, March 26, 2013

कार्यक्रम फोटोग्राफ्स 

Monday, February 25, 2013

मेहतर जाति की मुक्ति कैसे सम्भव है?


एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।


हजारों सालों से सबकी गंदगी की सफाई करने वाली जाति को मनुवादियों ने अनेकानेक घृणित नाम दिये हैं। जैसे-मेहतर, भंगी, शूद्र और आजकल स्वीपर कहा जाता। जिसे ढोंगी महात्मा मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी ने हरिजन कहा, जबकि गॉंधी इस बात से वाकिफ था कि गुजरात में जिसके मॉं-बाप का पता नहीं होता है, ऐसी नाजायज औलादों को हरिजन कहा जाता है।

इस जाति के लोगों की दशा समाज में निम्नतम दर्जे की है। सबसे घृणित कार्य यही भंगी कहलाने वाली जाति के लोगों द्वारा किये जाते हैं। आजादी के बाद भी इन्हें अछूत से छूत बनाने के लिये किसी भी सरकार की ओर से कोई रचनात्मक कदम नहीं उठाया गया। अलबत्ता शुरुआत में नगर निगमों, नगरपालिकाओं और सभी स्थानीय निकायों में घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई के लिये इन्हीं लोगों को सरकार द्वारा नियोजित किया जाने लगा। ये कहा जाये तो अनुचित नहीं होगा कि इन सभी घृणित समझे जाने वाले सफाई कार्यों में शतप्रतिशत इसी जाति के लोगों को नियुक्तियॉं दी जाने लगी।

इसके चलते एक अलिखित कानून बन गया कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने के लिये भंगी जाति के लोगों ने ही जन्म लिया है। अन्य किसी भी सरकारी नौकरी में आरक्षित वर्ग के लोगों की किसी त्रुटिवश एक फीसदी भी या एक भी अभ्यर्थी के अधिक नियुक्ति हो जाने पर मनुवादियों द्वारा तत्काल हो-हल्ला मचाना शुरू कर दिया जाता है और झट से मनुवादी संरक्षक न्यायाधीशों द्वारा ऐसे मामलों में संज्ञान ले लिया जाता है। कुछ मामले तो ऐसे भी हैं, जहॉं पर मनुवादी न्यायाधीशों द्वारा स्वयं ही संज्ञान लिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अनेक ऐसे निर्णय दिये हैं, जो संविधान की मूल भावना और आरक्षित वर्ग के लिये जरूर सामाजिक न्याय की मूल अवधारणा के विपरीत हैं। जिन्हें अनेक बार संसद ने निरस्त किया है। इसके उपरान्त भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है और आज तक न तो रुका है और न हीं रुकने वाला है।

जबकि इसके विपरीत घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में शतप्रतिशत केवल और भंगी जाति के लोगों की ही नियुक्ति की जाती है, लेकिन इसे आज तक न तो किसी मनुवादी ने अदालत में चुनौती दी और न ही इस देश की कथित न्यायप्रिय न्यायपालिका ने स्वयं संज्ञान लेकर भारत सरकार से नोटिस जारी करके सवाल पूछा कि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वाले कर्मचारियों में एक ही भंगी जाति के ही लोगों को क्यों नियुक्त किया जाता रहा है? अन्य और उच्च जाति के लोगों को इस कार्य में क्यों नियुक्तियॉं नहीं दी जाती हैं?

केवल यही नहीं पिछले दो दशक से तो इस असंवैधानिक व्यवस्था से पीछा छुड़ाने के लिये सरकारी, अर्द्ध-सरकारी और निजी क्षेत्र में एक नायाब तरीका निकाल लिया है-सफाई कार्य ठेके पर दिये जा रहे हैं। ठेके उच्च जाति के लोगों द्वारा लिये जाते हैं, जबकि घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई करने वालों में शतप्रतिशत केवल और केवल उसी भंगी/मेहतर जाति के लोगों को मनमानी शर्तों पर नियुक्त किया जाता है। इस चालाकीपूर्ण व्यवस्था में मोटी कमाई ठेकेदारों की होती है, जो सफाईकर्मियों से 10 से 12 घण्टे काम लेते हैं और मजदूरी के नाम पर तीन से चार हजार रुपये महावार वेतन देते हैं। उनका खुला शोषण होता है, कोई साप्ताहिक विश्राम तक नहीं दिया जाता है।

जबकि होना तो ये चाहिये कि सरकार या जिन किन्हीं निकायों या उपक्रमों या संस्थानों द्वारा ठेकेदारी पर कोई भी कार्य करवाया जाता है तो ठेके की शर्तों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिये कि जिस कार्य के लिये सरकार द्वारा अपने कर्मियों को जो वेतन दिया जाता है, उससे कम वेतन ठेकेदार द्वारा नहीं दिया जायेगा। यदि इतनी सी बात का ठेके की शर्तों में उल्लेख कर दिया जाये तो सभी क्षेत्र के कर्मियों का शोषण स्वत: रुक सकेगा और देश में मजदूरों को हड़ताल करने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इसी कारण पिछले दिनों मजदूरों ने देशव्यापी हड़ताल की थी, लेकिन ये जानकर मुझे आश्‍चर्य हुआ कि किसी भी मजदूर संगठन द्वारा ये मांग नहीं उठायी गयी कि जिस काम के लिये सरकार 20 हजार महावार वेतन देती है, उसी कार्य के लिये ठेकेदार 4 हजार में करवाता है, इस बात को रोकने के लिये सरकार ठेके की शर्तों में संशोधन क्यों नहीं करती है?

हमारे देश की व्यवस्था में सुधार के अनेक प्रयास हो रहे हैं, लेकिन मेहतर जाति के उत्थान के लिये कोई पुख्ता या कारगर कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। जिसके चलते आज भी आऊट सोर्सिंग के जरिये घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई इसी जाति के लोगों से नाम-मात्र की मजदूरी पर करवाये जा रहे हैं।

यहॉं पर मैं इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी समझता हूँ कि मेहतर/भंगी जाति के लोगों में आपसी सामाजिक एकता का अभाव होने के कारण भी उनका सारे देश में सरकार और ठेकेदारों द्वारा सरेआम इस प्रकार से शोषण किया जा रहा है। अन्यथा जिस दिन इस जाति के लोगों द्वारा सामाजिक रूप से एक होकर ये कड़ा निर्णय ले लिया जायेगा कि वे घरों, दफ्तरों, नालियों, सड़कों और अस्पतालों की गन्दगी की सफाई का कार्य अपनी शर्तों पर ही करेंगे, उसी दिन, बल्कि उसी क्षण इन्हें पचास हजार रुपये मासिक मजदूरी देने को भी सरकार और सफाई ऐजेंसियों को मजबूर होना पड़ेगा। बस एक दृढ और कड़ा निर्णय लेने की जरूरत है।

                           डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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Tuesday, November 13, 2012

ऊंची जाति की लड़की से शादी की सजा, दलितों के घर राख


तमिलनाडु में दलित लड़के और गैर दलित लड़की के प्रेम विवाह की सजा 148 दलित घरों को भुगतना पड़ा। 23 साल के इलावरसन 20 साल की दिब्या से प्रेम करता था। दिव्या भी उसको बेहद प्यार करती थी। दिब्या के घर वाले इस रिश्ते को किसी भी हाल में स्वीकार करने को राजी नहीं थे। करीब एक महीना पहले दिव्या अपने प्रेमी इलावरसन के साथ घर से भाग गई।

दिव्या और इलावरसन ने अपने प्रेम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए मंदिर में शादी कर ली। इस शादी से गैरदलित तिलमिलाए हुए थे। वे लगातार इलावरसन के परिवार वालों को धमकी देते रहे कि इस रिश्ते को खत्म कर लो। दिव्या के परिवार वालों ने इलावरन के घर जाकर धमकी दी। इलावरसन धमकी के मद्देनजर स्थानीय सेलम पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई। जब बात नहीं बनी तो गैरदलितो ने पंचायत करके दिव्या को वापस करने का फरमान सुनाया। दिब्या ने इसे नकारते हुए अपने पिता के घर जाने से इनकार कर दिया।

 

Tuesday, October 23, 2012

मैं मल में पड़ी रही कोई नहीं आया


अंबाला की रहने वाली सरोज रोज़ लोगों के घरों से उनका मलमूत्र सर पर ढोती रहीं लेकिन जब वो उसी मैले में गिर पडीं तो किसी ने उन्हें हाथ नहीं लगाया.

सरोज की उम्र अब 50 के पास पहुँच रही है लेकिन आज भी उस क्षण को याद करते हुए रो पड़ती हैं.
सरोज बताती हैं कि 13 साल की उम्र से वो मैला ढ़ोने का काम करती आई हैं.
"जब उन्होंने देखा कि मैं वाकई दर्द से बिलख रही हूँ और उठा नहीं जा रहा तो भी किसी ने उन्हें उठाया नहीं एक बांस नीचे लगा कर मुझे बैठा दिया. मुझे धमकाया और पुलिस की धमकी दी और कहा कि बिना साफ़ करे वहां से हिल नहीं सकती"

सरोज, पूर्व सफाई मजदूर

वो सालों तक यह काम करती रहीं क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई और काम नहीं था. वो याद करती हैं कि किस तरह अपनी गर्भावस्था के दौरान एक दिन वो एक लकड़ी की सीढ़ी से सिर पर लोगों का मलमूत्र साफ़ कर नीचे उतर रहीं थीं कि वो सीढ़ी टूट गई.
सारा मैला सरोज के सिर पर गिर पड़ा और वो खुद ऊँचाई से ज़मीन पर आन पडीं. वो मदद के लिए गुहार लगाती रहीं लेकिन बदले में उन्हें मिली सर्फ गलियां.
सरोज कहतीं हैं, "जब उन्होंने देखा कि मैं वाकई दर्द से बिलख रही हूँ और उठा नहीं जा रहा, तो भी किसी ने मुझे उठाया नहीं, बल्कि एक बांस नीचे लगा कर मुझे बिठा दिया. मुझे धमकाया और पुलिस की धमकी दी और कहा कि बिना साफ़ करे वहां से हिल नहीं सकती."
डरी हुई सरोज ने बिलखते हुए वो जगह साफ़ की और किसी तरह घर पहुँचीं.

'अदृश्य भारत'

 
भारत में सफाई मज़दूरों की व्यथा और इस मैले पेशे से बाहर आने की उनकी लड़ाई को भाषा सिंह ने पास से देखा है और कई किस्से लिपिबद्ध किए हैं.
सरोज की तरह की मंदसौर की लीला बाई ने जब मैला ढ़ोने से मना किया तो पूरे गावं ने उनकी एक स्वर से निंदा की और उन्हें गावं से बाहर निकल जाने को कहा.
डरे हुए उनके पति और पीढ़ीयों से इसी काम में लगे उनके ससुराल वालों ने उन्हें बहुत प्रताड़ित किया लेकिन वो टस से मस ना हुईं.
आज लीला बाई मेहनत मज़दूरी कर के खाती हैं और अपने जैसे अन्य लोगों को इस पेशे से बाहर निकालने के लिए काम कर रहीं हैं.
लीला बाई कहती हैं "सरकारी योजनाएँ केवल दिल्ली में ही सुनाई देतीं हैं गावों बस्तियों में दिखाई नहीं देतीं. "
 2011 की जनगणना के बाद साढ़े सात लाख लोग भारत में मैला ढ़ोने का काम करते हैं."
केंद्रीय योजना आयोग अपने शौचालय को ठीक करने के लिए लिए 35 लाख ख़र्च कर सकता है लेकिन मैला ढ़ोने की अमानवीय परंपरा पर कोई कारगर योजना नहीं बना सकता.

 

Monday, October 22, 2012

दलित का बाइक चलाना नागवार गुजरा, नाक काट डाली

मध्य प्रदेश में 31 वर्षीय प्रकाश जाटव नाम के दलित की नाक इसलिए काट दी गई क्योंकि वह बाइक चला रहा था। ऊंची जाति के जिन लोगों ने उसकी नाक काटी उनका कहना था कि प्रकाश उनके सामने बाइक नहीं चला सकता है।

बताया जा रहा है कि इस घटना को अंजाम देने में 12 लोग शामिल थे। इन लोगों ने पहले प्रकाश की जमकर पिटाई की और उसके बाद एक चाकू निकाला और उसकी नाक काट दी। जानकारी के मुताबिक इस हरकत को अंजाम देने वाले लोग कुशवाहा समाज से हैं और उन्हें प्रकाश की तरक्की से काफी जलन थी। इसके चलते उन लोगों में प्रकाश में कई बार नोंक-झोंक भी हो चुकी थी। नाक काटने के बाद सभी उसे खून में लथ-पथ छोड़कर भाग गए।


दलित और आदिवासी समुदायों को आज भी उत्पीड़न के दंश


 छह दशक से ज्यादा की आजादी और जनतंत्र के बावजूद अगर समाज का एक बड़ा तबका अपने खिलाफ होने वाली हिंसा के सामने खुद को असहाय पाता है तो निश्चय ही यह एक विचलित कर देने वाली स्थिति है। लेकिन सच्चाई यही है कि  से मुक्ति नहीं मिल सकी है। बल्कि पिछले कुछ सालों में इन वर्गों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। पिछले हफ्ते राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने 'अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून-1989 और नियम-1995 के कार्यावन्यन की स्थिति' विषय पर एक रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट बताती है कि दलितों और आदिवासियों को अत्याचार से बचाने के लिए विशेष कानून तो बना दिए गए, पर इन्हें ठीक से लागू नहीं किया गया। यही कारण है कि इन विशेष कानूनों के बावजूद उनके खिलाफ हिंसा का सिलसिला थमा नहीं है, बल्कि बढ़ता गया है। देश भर में ऐसी घटनाओं की पड़ताल के बाद तैयार की गई इस रिपोर्ट में कई वैसे तथ्य सामने आए हैं जो इन वर्गों के उत्पीड़न की बदलती प्रकृति और उसमें कमी न आ पाने के कारणों पर रोशनी डालते हैं।
दरअसल, समाज के ताकतवर समूहों के भीतर दलितों-आदिवासियों के प्रति सामंती और मध्ययुगीन पूर्वग्रह अब भी बने हुए हैं। कई ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं जिनमें बेहद मामूली बातों के लिए ऊंची कही जाने वाली जाति के लोगों ने किसी दलित बस्ती पर हमला कर दिया और घरों में आग लगा दी। कहीं सिर्फ इसलिए किसी युवक को मार डाला गया,   क्योंकि वह किसी वंचित जाति से होने वजूद पढ़ने में तेज था। हाल ही में खुद मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को अपने गुजरात दौरे के क्रम में इस शिकायत से रूबरू होना पड़ा कि वहां के कम से कम सतहत्तर गांवों में सवर्ण जाति के लोगों ने दलितों का बहिष्कार करके उन्हें गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। यह उस राज्य की हकीकत है जिसके तेज विकास का जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। वहां दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाय पुलिस अक्सर दलित उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करने से ही इनकार कर देती है। फिर, किसी तरह दर्ज मामलों में सजा सुनाए जाने की दर महज पांच फीसद है।
देश के दूसरे इलाकों में भी तस्वीर इससे ज्यादा अलग नहीं है। इसकी पुष्टि करते हुए इस रपट में कहा गया है कि दर्ज मामलों में कम से कम एक चौथाई को जांच के क्रम में ही 'त्रुटिपूर्ण तथ्यों' का हवाला देकर रफा-दफा कर दिया जाता है या उन्हें अनुसूचित जाति-जनजाति कानून से संबंधित धाराओं के बजाय सामान्य कानूनों के तहत दर्ज किया जाता है। यानी पीड़ितों की मदद करने के बजाय एक तरह से समूचा तंत्र आरोपियों को बचाने या मामले को हल्का बनाने में ही अपनी ऊर्जा लगा देता है। कई बार अदालतें भी ऐसे मामलों में इंसाफ से दूर खड़ी नजर आती हैं। बिहार के बथानी टोला हत्याकांड मामले में पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसले से ऐसा ही संदेश गया है। इसलिए मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने ठीक ही अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत दर्ज मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष सरकारी वकील और अलग अदालतों के गठन की वकालत की है। आयोग की इस सिफारिश को स्वीकार किया जाना चाहिए।

Sunday, October 21, 2012

 महोदया खतरा मेरी सुरक्षा कौन करेगा। 

सेवा में ,
माननीया श्रीमती मीरा कुमार जी 
अध्यक्ष
लोकसभा  
महामहिम राष्ट्रपति जी 
भारत सरकार

महोदय ,
 मैं प्रभात  रंजन अनुसूचित जाति  से  आता हूँ ।मैं अपने  मोहल्ले के ऊँची  जाती के लोगो द्वारा बहुत दिनों से प्रताड़ित किया जाता  रहा हूँ। जब बर्दास्त के बाहर हो गया तो न्याय की आस में स्थानीय अनुसूचित जाति / अनुसूचित जाति थाना में अपना रिपोर्ट दर्ज  कराने गया तो  वहां मेरा आवेदन लिया गया लेकिन  कोई RECIEVING नहीं दी गई । उसके बाद पता चला की स्थानीय बरियातु थाना में मेरा आवेदन अग्रसारित कर दिया गया है।स्थानीय बरियातु थाना में बहुत रिक्वेस्ट किया उसके बाद यहाँ आकर जाँच किया  गया ।फिर कुछ  नहीं किया गया।जब मैंने स्थानीय थाना से जानकारी लेनी चाही तो जवाब मिला की तुम्हारे पछ में कोई गवाह नहीं मिलेगा।और sc/st
 केस के झमेले में मुझे नहीं पड़ना।मैंने कहा की स्थान पर आपने जो पाया उसी को देखिये।लेकिन उसपर अभी तक कुछ नहीं हुआ।यहाँ मैंने देखा की किस तरह से sc/st के मामले को दबा दिया जाता है तथा जो व्यक्ति वहाँ जाता है उसको किस तरह और बेचारा बना दिया जाता है ।sc/st थाना जाने और आवाज़ उठाने की वज़ह से अब मेरे जान पर बन गयी है।अगर मुझे कुछ होता है तो उसका जिमेवार कौन होगा।साथ ही ऐसे sc/st थानों ,sc/st आयोग का क्या मतलब है जहाँ सबकुछ सिर्फ एक दिखावा है।ये दिखावा क्यों । sc/st  के नाम पर खानापूर्ति क्यों। सधन्याबाद ।

विश्वश्भाजन  

 प्रभात रंजन 
रांची ,झारखण्ड 

नोट : थाना में दीये गये अपने आवेदन की प्रति भेज रहा हूँ ।